pm aur putin
Vo: रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष छह महीनों से लगातार जारी है और अब रूसी सेना को कुछ जगहों पर पीछे भी हटना पड़ा है.
ऐसे में ये सवाल लाज़मी है कि व्लादिमीर पुतिन पर इसका क्या राजनीतिक असर पड़ेगा?आख़िरकार बीते दो दशक से अधिक वक्त से रूसी संभ्रांत वर्ग के बीच पुतिन की छवि एक विजेता की रही है, मुश्किल से मुश्किल स्थिति से वो खुद को बाहर निकाल सके हैं और अपनी छवि को बरकरार रख सके हैं.
रूस और यूक्रेन की लड़ाई भले ही सतही तौर पर दो देशों के बीच की लग रही हो, लेकिन ये बड़े देशों के बीच अहम की लड़ाई है - रूस और अमेरिका, रूस और नेटो देशों की, जिसकी वजह से बड़े देशों के रिश्ते तनावपूर्ण हो गए हैं. ये दोनों पक्षों के मिस-मैनेजमेंट का नतीजा है जिसका इतिहास पुराना है. इस वजह से भारत किसी के साथ खड़ा नहीं हो सकता."
बात करें भारत और रूस के रिश्ते की तो यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद भारत के रुख़ को लेकर कई पूर्व राजनयिक और कूटनीति के विश्लेषकों की राय बंटी हुई है.
रूस से भारत के रिश्ते बहुत अच्छे हैं. जब भी चीन के ख़िलाफ़ मदद चाहिए होती है तो भारत रणनीति के तहत रूस के पास ही जाता है. लद्दाख ही नहीं उससे पहले भी जब-जब चीन, भारतीय सीमा विवाद में उलझा है, मोदी सरकार ने रूस का दरवाज़ा खटखटाया है. भारत का मानना है कि चीन पर अगर किसी देश का प्रभाव है तो वो रूस का है."
चीन एंगल के अलावा, रक्षा क्षेत्र में रूस पर भारत की निर्भरता को भी एक कारण के रूप में देखा जाता है
हथियारों की ख़रीद में रूस पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भारत अब फ़्रांस, अमेरिका, इज़रायल, ब्रिटेन से भी हथियार ख़रीद रहा है. लेकिन रूस पर रक्षा क्षेत्र में हमारी दूसरी़ क़िस्म की निर्भरता भी है. अगर भारत में डीआरडीओ मिसाइल बनाता है तो उसमें रूस से भारत को मदद मिलती है, दूसरे देशों से नहीं. न्यूक्लियर सबमरीन में भी रूस जो मदद कर सकता है, वो अमेरिका नहीं कर सकता. रूस भारत को जिस तरह की तकनीक देता है, दूसरे देश नहीं देते. इस लिहाज से देखें तो भारत के रक्षा और सुरक्षा प्रणाली की नीतियों का 'आधार बिंदु' रूस है.
चीन और रक्षा क्षेत्र में रूस की मदद के अलावा भारत के रुख़ के कई और अहम पहलू भी हैं जिन पर रक्षा और विदेश मामलों की जानकार डॉक्टर स्वास्ति राव प्रकाश डालती हैं.
वो बताती हैं कि भारत, ईरान, रूस, मध्य एशियाई देशों के बीच माल ढुलाई के लिए जहाज़, रेल और सड़क मार्ग का 7200 किलोमीटर लंबा एक नेटवर्क है जिसे उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा कहा जाता है.
भारत के लिए ये ट्रेड ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बहुत अहम है. इस इलाके में भारत चाबहार के अलावा बस इसी एक ट्रेड नेटवर्क का हिस्सा है. ये ऐसा कॉरिडोर भी है जिसका हिस्सा पाकिस्तान और चीन नहीं है. इस नेटवर्क में बने रहने के लिए रूस के साथ अच्छे रिश्ते रखना भारत के लिए ज़रूरी है.
वो आगे कहती हैं कि भारत मध्य एशिया में अपना दख़ल बढ़ाना चाहता है. इस साल 26 जनवरी को भारत ने मध्य एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को निमंत्रण भी दिया था. इन देशों में बिज़नेस और कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए भारत इच्छुक है और इन देशों पर रूस का अपना अलग प्रभाव है. इस लिहाज से भी भारत रूस को नाराज़ नहीं कर सकता. अफ़ग़ानिस्तान में भी भारत को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए रूस की ज़रूरत पड़ेगी.
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