चुनाव और कोरोना की मोहब्बत में सियासतदार


अजय शर्मा वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक 
कोरोना भी सियासतदारों को चुनाव की मोहब्बत से अलग नहीं कर सका। यह ऐसी मोहब्बत है जिसमें सियासतदार जुदाई बरदाश्त नहीं कर सकते। ऐसा इश्क अभी तक आपने दो प्यार करने वाले आश्किों में देखा था जो किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। जो इस मोहब्बत में कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। उनके लिए सबकुछ यह मोहब्ब्त होती है। चाहे अपनी जान क्यों ना देनी पड़े। इस वक्त आपको प्यार, इश्क, मोहब्ब्त के जुनून पर लिखे गए गीत, कविताए, शेर याद आ रहे होगे। कैसे आशिक अपने प्यार के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा देते हैं उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं होती। किसी की जान भी लेने से नहीं हिचकते। इतिहास भी ऐसे कुछ बडे बड़े युद्धों का गवाह है जो सिर्फ मोहब्बत में लड़े गए। जिसमें खून बहा, चिंताएं चलीं, लाशें नदियों में बहीं। लाशों को आवारा पशुओं और चील गिद्धों ने नोच नोच कर खाया। लेकिन मोहब्बत का जूनून कभी कम नहीं पड़ा। 

ऐसी ही मोहब्बत चुनाव को लेकर देखने के लिए मिल रही है जिसमें कोरोना का कोई डर नहीं है। चाहे कोरोना कितनी भी जिदंगियां क्यों ना छीन ले। चाहे कितनी भी जिंदगियों की बलि क्यों ना चढ़ जाए। लेकिन चुनाव कराना बहुत अनिवार्य है। चुनाव नहीं टाले जा सकते। चुनाव और सियासतदारों की मोहब्बत के आगे कोरोना क्या बिसात। चुनाव और सियासत में कोरोना से डरना मना है। क्या होगा ज्यादा से ज्यादा कुछ हजार या लाखों की जिदंगी खतरे में ही तो पड़ेगी। अगर खतरों से डरेगे तो कर ली सियासत, जीत लिया चुनाव। हमारी इस मोहब्बत में कोरोना चाहे जो कर ले। लेकिन सत्ता का सुख तो मिलेगा। 

पिछली बार कोरोना की दूसरी लहर में भी हमने पांच राज्यों के चुनाव देखे थे। जिसमें कोरोना का तांडव सबने देखा। लेकिन सियासतदारों की मोहब्ब्त के आगे कोरोना ने हजारों जिदंगियां डकार ली। आपको याद होगा पिछली बार दूसरी लहर में पंचायत चुनाव हुए थे। गांव देहातों की क्या हालात थी किसी से छिपा हुआ नही है। इस बार कोरोना की तीसरी लहर में एक बार फिर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव है। हमारे गृह राज्य उत्तर प्रदेश में भी चुनाव है। चुनावी रैलियों में अरविंद केजरीवाल और प्रियंका गांधी वाडा भी कोरेाना से संक्रमित हो चुके है और पता नहीं कितने सैकड़ों कार्यकर्ता होगे जो कोरोना की गिरफ्त में होगे। लेकिन चुनाव की मोहब्ब्त के आगे कोरोना से क्या डरना। सियासतदार यह कहकर अपने दामन पर छींटे नहीं पड़ने देना चाहते कि चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। जबकि चुनाव सत्ता के सुख लिए करवाए जा रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है क्योंकि चुनाव और कोरोना की मोहब्बत में सियासतदार मदमस्त है, मदहोश हैं।

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