क्या चंद्रशेखर रावण अखिलेश यादव को नुकसान दे पाएंगे


अजय शर्मा 
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक  
चंद्रशेखर अब आजाद होकर चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं। वे अखिलेश यादव को धोखेबाज कह रहे हैं। महत्वपूर्ण सवाल है कि बगैर कुछ किए ही अखिलेश यादव धोखेबाज कैसे हो गये? चंद्रशेखर आजाद यह भी कह रहे हैं कि अखिलेश यादव को दलितों को साथ लेकर चलना ही नहीं है। वे ऐसा चाहते ही नहीं हैं। यह वही भाषा है जो अखिलेश के लिए भाजपा बोलना चाहती है। सवाल यह है कि क्या अखिलेश भाजपा के बुने जाल में फंस गये हैं? या फिर अखिलेश यादव ने भाजपा को ही अपने जाल में फंसा लिया है। 

धोखा किसने किसको दिया? भाजपा दरबार से लिखी गई है पूरी पटकथा
धोखा किसने किसको दिया? चंद्रशेखर ने अखिलेश को या फिर अखिलेश ने चंद्रशेखर को? अखिलेश यादव भोले निकले। वास्तव में दलितों के हितों की रक्षा के मोह में ही उन्होंने चंद्रशेखर को तवज्जो दी। मगर, चंद्रशेखर को आजाद ही रहना था। उन्हें अखिलेश यादव के साथ जुड़ना ही नहीं था। यह पूरी पटकथा भाजपा दरबार से लिखी गई है और उस पर चंद्रशेखर ने अमल किया है।

आपको याद दिला दूं कि दलित वोटों पर पकड़ मजबूत बनाने के लिए चंद्रशेखर आजाद या रावण को मायावती के बरक्स खड़ा करने की कोशिश बहुत पहले शुरू की जा चुकी थी। मगर, मायावती ने कभी इस सियासत को आगे बढ़ने नहीं दिया। अब उन्हीं चंद्रशेखर का इस्तेमाल सपा प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ बहुत ही सपाट तरीके से किया जा रहा है।

 दलितों का दुश्मन कौन 
चंद्रशेखर के बहाने दलितों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि समाजवादी पार्टी दलितों की जन्मजात दुश्मन है और वह कभी दलितों को दिल से अपने साथ करने को तैयार नहीं है। ऐसा करके बसपा के दरकते दलित वोट बैंक का फायदा कहीं समाजवादी पार्टी न ले जाए, इस संभावना को खत्म करने का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा की यह सियासी चाल है। जिससे उसे यूपी के चुनाव में फायदा मिल सके। लेकिन सपा का जवाब भाजपा के लिए कठिनाइयां पैदा करने वाला हो सकता है। 
क्योकि डबल इंजन की सरकार के लिए नाराजगी दलितों में भी है मगर दलित वोटरों को बसपा कमजोर नजर आ रही है। ऐसे में उनके लिए समाजवादी पार्टी स्वाभाविक पसंद है।
 
क्या सचमुच चंद्रशेखर गोरखपुर से योगी को हराने के लिए लड़ेंगे?
चंद्रशेखर आजाद ने कहा है कि जरूरत पड़ी तो वे योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भी गोरखपुर से चुनाव लड़ेंगे। क्या वे योगी आदित्यनाथ को हराने के लिए चुनाव लड़ेंगे?- यह सवाल महत्वपूर्ण है। स्थानीय समीकरण में योगी विरोधी वोटों के बिखराव को सुनिश्चित करने के लिए चंद्रशेखर आजाद चुनाव लड़ेंगे। इससे योगी की हार नहीं, जीत सुनिश्चित होगी। वास्तव में चंद्रशेखर आजाद की यही भूमिका पूरे उत्तर प्रदेश के संदर्भ में रहने वाली है।

  चंद्रशेखर आजाद ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर सियासी आक्रमण तो किया है लेकिन अखिलेश यादव इस चाल को अच्छी तरह से जानते थे इसलिए उन्हें एक चकव्यूह में लाया गया है। जिसके परिणाम आने बाकी है। कुछ सुलगते सवाल है कि चंद्रशेखर के पीछे खड़ी सियासी ताकत कौन है? किसके दम पर चंद्रशेखर आजाद 33 सीटों पर चुनाव लड़ने का दंभ दिखा रहे हैं? चंद्रशेखर आजाद अगर एक नेता के रूप में उभरे हैं तो इसके पीछे कौन लोग हैं? चंद्रशेखर के उद्भव से किसे फायदा हो रहा है या हो सकता है?
चंद्रशेखर आजाद भाजपा को मदद करते दिख रहे हैं?

एक ऐसे समय में जब ओबीसी का भाजपा से मोहभंग हुआ है, भाजपा दलित वोटों को अपने आमने-सामने के प्रतिद्वंद्वी के बरक्स इकटठा नहीं होने देना चाहती। इस रणनीति में चंद्रशेखर भाजपा के लिए बेहद मुफीद हैं। अगर चंद्रशेखर ने तीन दर्जन सीटों पर समाजवादी पार्टी को रोक लिया तो भाजपा की रणनीति सफल हो सकती है। भाजपा को बसपा से खतरा कतई नहीं है। जरूरत पड़ने पर बसपा सरकार बनाने में उसकी मदद कर दे सकती है। लेकिन, समाजवादी पार्टी को सत्ता से दूर रखना उसकी अहम रणनीति है। जिसके लिए चन्द्रशेखर का इस्तेमाल किया जा रहा है। 

अखिलेश यादव इस मायने में बहुत भोले रहे कि उन्होंने आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह  के साथ भी तस्वीरें खिंचा ली और चंद्रशेखर आजाद के साथ भी। दोनों से उनकी बात नहीं बनी। संजय सिंह सियासत के चतुर खिलाड़ी हैं। उन्होंने अंदरखाने की बातचीत को बाहर नहीं किया और इसका फायदा कोई और पार्टी न उठा ले जाए, इसके प्रति भी वे सजग रहे। लेकिन अखिलेश यादव को यह मालूम था कि आम आदमी पार्टी के संजय सिंह सियासी नुकसान पहुंचा सकते हैं इसलिए उनके साथ मुलाकातों की तस्वीरें सार्वजनिक की गई। यह आम आदमी पार्टी की सियासी भूल ही कही जाएगी।

बिहार के फॉर्मूले पर यूपी में चल रही है भाजपा? 
बिहार में जिस तरह से अपने ही सहयोगी लोकजनशक्ति पार्टी को भाजपा ने दो फाड़ कर दिया और इसके लिए दलित नेता जीतन राम मांझी का इस्तेमाल किया- उसे भी याद रखना जरूरी है। जीतन राम मांझी को चुनाव के ठीक पहले तेजस्वी यादव खेमे से दूर किया। तेजस्वी के लिए यही संदेश दिया गया कि यादव होने के नाते वे दलितों के साथ सहज नहीं हैं और गठबंधन के लिए भी गंभीर नहीं हैं। निषाद वोटों के लिए ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहे जाने वाले मुकेश सहनी  को आरजेडी से तोड़कर भाजपा ने अपने खेमे में जोड़ा था। चुनाव नतीजे बताते हैं कि भाजपा की रणनीति बहुत सफल रही थी।

अखिलेश यादव ने जिस तरीके से ओम प्रकाश राजभर और उनके इकटठा किए गये कुनबे को अपने साथ जोड़ते हुए गैर यादव ओबीसी वोटरों को एकजुट किया, उसके बाद भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग पर शोध को और अधिक मजबूत किया। अब भाजपा की नजर दलित वोटों को बांटने, गैर जाटव वोटों को बसपा से अलग करने और कुल मिलाकर समाजवादी पार्टी को दलितों का दुश्मन बताने पर टिक गई।

किसने किसको दिया धोखा?
प्रियंका गांधी ने भी चंद्रशेखर के पास आने की कोशिश की थी जिसका फायदा भी चंद्रशेखर को मिला। वास्तव में भाजपा अगर चंद्रशेखर का राजनीतिक इस्तेमाल करने की सोच रही है तो इसके पीछे वजह चंद्रशेखर को मिला कांग्रेस का साथ ही था। प्रियंका गांधी ने चंद्रशेखर को राजनीतिक हैसियत मजबूत करने में मदद की। आज वे प्रियंका और कांग्रेस से भी दूर हैं। चंद्रशेखर का हर कदम भाजपा के लिए सत्ता की राह आसान करने वाला दिखता है। भाजपा की राह आसान करने वाले चंद्रशेखर और औवेसी दिखाई दे रहे हैं। सपा की लहर को रोकना इतना आसान नहीं होने वाला है।

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