समाजवाद है समाज की आत्मा
समाज के अंदर आज भी जातियों का जाल जिंदा है। आज भी हमारा जीवन जातियों में जी रहा है। इससे बाहर निकलने के लिए शिक्षित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। निम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक इसमें फंसा हुआ है। इस खाई को बढ़ाने का काम अमीरी और गरीबी ने भी किया है। इसने आदमी को दो खाइयों में बांट दिया है। आज भी समाज में नर नारियों के बीच दूरियां हैं। इसे पाटने के लिए समाजवाद को नये सिरे से आम जनमानस को समझाने की आवश्यकता है।
समाजवाद की जब बात होती है तो कुछ नाम हमारे सामने तैरने लगते है। महात्मा गांधी, मार्क्स, राम मनोहर लोहिया, पं जनेश्वर मिश्र, कर्पूरी ठाकुर आदि। भारत में गांधी पूर्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तो मार्क्स पश्चिम का। लेकिन संपूर्णता का अभाव दोनो में देखने के लिए मिलता है। वहीं राम मनोहर लोहिया के विचार, उनका सामाजिक, राजनीतिक चिंतन, उनका आधुनिक दृष्टिकोण समाज को नई दिशा देने वाला दिखाई देता है। वे समाज में समानता, नई सभ्यता, नई संस्कृति के दृष्टा थे। समाजवाद को लेकर उनके विचारों, चिंतन, दृष्टिकोण को राजनीति व समाज में कुछ नेताओं ने आगे बढ़ाया जिसे लोगों ने सराहा। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव से लेकर बिहार में लालू प्रसाद यादव तक ने इसे पोषित किया। चाहे वह स्व राम विलास पासवान हो या फिर नीतीश कुमार। समाजवाद को उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिंदा रखा हुआ है। वे इस वक्त के एक बड़े समाजवादी नेता हैं। उन्होंने जाति और धर्म से उपर उठकर समाज को एकजुट करने का प्रयास किया है। वे अमीरी और गरीबी की खाई को पाटने का प्रयास करते देखे जा सकते है। शिक्षा के मामले में भी वे एक आधुनिक दृष्टिकोण रखते हैं। नई टेक्नोलॉजी को अपनाने को लेकर हर वक्त तैयार हैं।
गाजियाबाद से साहिबाबाद के पूर्व विधायक व समाजवादी नेता पं अमरपाल शर्मा भी समाजवादी विचारधारा को समाज में रोपने का काम कर रहे हैं। वे लोगों का जीवन स्तर सुधारने का नजरिया रखते हैं। पं अमरपाल शर्मा से एक अनौपचारिक बातचीत में मैंने समझा कि वे भड़भड़ करने वाले व्यक्ति को पसंद नहीं करते, उनका मानना है ऐसे लोग कुछ भी नहीं कर सकते, ये लोग ना क्रांति कर सकते हैं। ये लोग ना ही ज्यादा काम कर सकते हैं। ये ना ही किसी का नेतृत्व कर सकते हैं। बल्कि गंभीरता के साथ काम करने वालों की आवश्यकता है। व्यवहार और विचारों में ओजस्विता की आवश्यकता है। तेजस्विता की आवश्यकता है।
मौजूदा हालातों को देखंे तो समझ में आता है कि देश में गरीबी और असमानता अभी भी रावण का रूप लिए हुए है। राजनीतिक पार्टियां इसलिए अपने घोषणा पत्र में फ्री राशन या 1 से लेकर 2 रूपए किलो अनाज देने का वादा करती हैं। यह प्रजातांत्रिक अधिकारों के लिए शुभ नहीं है। गरीबी और बेरोजगारी प्रजातांत्रिक अधिकारों को निगल जाती है। ऐसे में समाजवादी विचारधारा की अनिवार्यता समझ में आती है। पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही समाज के लिए अच्छे नहीं माने जा सकते इसके परिणाम असमानता और विद्रोह पैदा करने वाले हो सकते हैं।
ऐसे समाजवादी विचार धारा एवं उददेश्य जनहित में काम कर सकते हैं। मेरा मानना है लोगों को अपने राजनीतिक अधिकारों को लेकर जागरूक होना चाहिए। लोगों को अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों को लेकर भी सचेत होना चाहिए और बेहतर जीवन के लिए इनका इस्तेमाल करना चाहिए। मैं लोगों से आग्रह करता हूं कि वे अपने वोट के अधिकार का उपयोग संपूर्ण चिंतन के बाद विवेक के साथ करें अन्यथा सामाजिक जीवन नरक बनते देर नहीं लगेगी।
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